आजादी के इतिहास का गवाह खुमाड़

अगस्त 1942 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में ‘भारत छोड़ो’ और ‘करो या मरो’ के आह्वान चल रहा था । सल्ट पहले से ही राजनीतिक रूप से जागृत था। लिहाजा यहां भी आंदोलन ने तेजी पकड़ ली।

पांच सितंबर 1942 वो दिन जिस दिन सल्ट के खुमाड़ में बड़ी संख्या में ग्रामीण और आंदोलनकारी एकत्र थे। उनका उद्देश्य अंग्रेजी शासन के विरोध में अपनी आवाज बुलंद करना था। प्रशासन ने प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने का प्रयास किया। लोगों ने नेताओं से गिरफ्तारी न देने और शांतिपूर्ण ढंग से डटे रहने का आग्रह किया।

तभी वहां एसडीएम जॉनसन, पुलिस, पटवारी,और अन्य कर्मचारियों के साथ खुमाड़ पहुंचा, उसने जब भीड़ देखी तो पुलिस को सीधे गोली चलाने का आदेश दे दिया। गोलियों की बौछार में खुमाड़ निवासी गंगाराम (33) और खीमानंद (23), पुत्र टीकाराम, घटनास्थल पर ही शहीद हो गए। स्वतंत्रता सेनानी चूड़ामणि (56) और बहादुर सिंह (52) गंभीर रूप से घायल हुए, जिनमें चूड़ामणि बाद में शहीद हो गए। कई अन्य आंदोलनकारी भी घायल हुए। खुमाड़ की धरती इन स्वतंत्रता सेनानियों के रक्त से लाल हुई, लेकिन इसी बलिदान ने इसे स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में अमर कर दिया। सल्ट के इसी अदम्य प्रतिरोध के कारण महात्मा गांधी ने इसे ‘कुमाऊं की बारदोली’ की संज्ञा दी। खुमाड़ स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृतियों का प्रमुख केंद्र बन गया।

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