कांग्रेस की शिकायत पर उत्तराखंड चुनाव आयोग ने बागेश्वर की जिलाधिकारी से मांगा जवाब

सवाल
विधानसभा सत्र के दौरान टेलेविज़न चैनलों के लाइव टेलीकास्ट पर बबाल ,
पार्वती दास ने चार और पांच सितम्बर को कैसे छापा एक पेज का विज्ञापन , ये आचार संहिता का उल्लंघन है,

राजसत्ता न्यूज़ ब्यूरो

देहरादून 06 सितम्बर। कांग्रेस पार्टी ने विगत 29 अगस्त को मुख्य निर्वाचन अधिकारी उत्तराखंड से मिलकर उन्हें एक ज्ञापन सौपा था जिसमे पार्टी ने कहा था कि आम तौर पर चुनाव कार्य सम्पन्न कराने में लगे अधिकारियों एवं कर्मचारियों से अपेक्षा की जाती है कि वे निर्वाचन के काम को स्वतंत्र, निष्पक्ष एवं पारदर्शी तरीके से सम्पन्न कराएंगे। लेकिन अफसोस ये है कि बागेश्वर की जिलाधिकारी एवं जिला निर्वाचन अधिकारी- श्रीमती अनुराधा पाल एवं उनके अधीनस्थों का व्यवहार एवं कार्यप्रणाली उक्त पैमाने पर खरी उतरती नहीं दिखाई दी।

इस मामले में तीन वामपंथी पार्टियों- भाकपा, माकपा, भाकपा(माले) की ओर से भी उसी दिन 29 अगस्त को उत्तराखंड के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को पत्र भेज कर सूचित किया गया था कि ये पार्टियां 1 सितंबर 2023 को बागेश्वर में एक प्रेस वार्ता को संबोधित करेंगे। हमारे पत्र के क्रम में उत्तराखंड के सहायक निर्वाचन अधिकारी मस्तू दास ने 30 अगस्त को पत्रांक संख्या 1543 / XXV- 10 / 2023 के द्वारा जिलाधिकारी एवं जिला निर्वाचन अधिकारी, बागेश्वर से कहा कि वे तीन वामपंथी पार्टियों के नेताओं की 1 सितंबर को बागेश्वर में प्रेस कॉन्फ्रेंस की अनुमति के संबंध में नियमानुसार आवश्यक कार्यवाही करने हेतु संबंधित को निर्देशित करने का कष्ट करें।

लेकिन बागेश्वर में प्रेस वार्ता की अनुमति मांगने की प्रक्रिया में हमें ऐसा प्रतीत हुआ जैसे कि बागेश्वर की जिलाधिकारी और उपजिलाधिकारी, बागेश्वर को मुख्य निर्वाचन अधिकारी, उत्तराखंड के कार्यालय से भेजे हुए पत्र की कोई परवाह ही नहीं थी। उपजिलाधिकारी, बागेश्वर जो कि 47 बागेश्वर विधानसभा क्षेत्र के रिटर्निंग अफसर भी हैं, उन्होंने प्रेस वार्ता की अनुमति के लिए पहले आनाकानी की और फिर शर्त लगा दी कि अनुमति तभी मिलेगी, जब हम लिख कर देंगे कि हम प्रेस वार्ता में क्या बोलेंगे. यह भी शर्त लगा दी गयी कि प्रेस वार्ता में जो हमें बोलना है, वो कागज़ पर हाथ से लिख कर देना होगा।

पार्टी ने आरोप लगाया कि उत्तराखंड राज्य में 2002 से चुनाव हो रहे हैं, लेकिन बीते 20-21 वर्षों में प्रेस वार्ता करने के लिए ऐसी शर्तें पहले कहीं देखने-सुनने में नहीं आई. प्रेस वार्ता कमरे के भीतर होने वाला कार्यक्रम है तो इससे किसी तरह के ट्रैफिक या कानून व्यवस्था में विघ्न की भी कोई संभावना नहीं होती. लेकिन मुख्य निर्वाचन अधिकारी, उत्तराखंड के कार्यालय से पत्र भेजे जाने के बावजूद इस तरह की शर्तें थोपे जाना समझ से परे था। इस संदर्भ में जब हमने जिलाधिकारी, बागेश्वर से बात की तो उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि हमारी पार्टियां चुनाव नहीं लड़ रही हैं तो हमें प्रेस वार्ता की अनुमति क्यूँ मिलनी चाहिए !

आदर्श चुनाव आचार संहिता से लेकर अन्य किसी भी कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि जो चुनाव नहीं लड़ रहा, उसके बोलने, वैचारिक अभिव्यक्ति के सारे अधिकार बंधक हो जाते हैं ! लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि बागेश्वर की जिला निर्वाचन अधिकारी/जिलाधिकारी श्रीमती अनुराधा पाल एवं उपजिलाधिकारी / रिटर्निंग अधिकारी- 47 बागेश्वर विधानसभा क्षेत्र ने सत्तापक्ष के दबाव अथवा झुकाव में नियम-कायदों की सीमा को पार कर लिया है. इसलिए वे सत्तापक्ष के इतर पार्टियों को प्रेस वार्ता जैसी सामान्य गतिविधि की अनुमति देने में भी हर संभव बाधा उत्पन्न करने की कोशिश करते रहे. बागेश्वर के पत्रकारों को भी उनसे काफी शिकायतें हैं।

उन्होंने चुनाव आयोग से अपील की कि कि बागेश्वर की जिलाधिकारी एवं उपजिलाधिकारी को कठोर निर्देश दिये जाएँ कि वे स्वतंत्र,निष्पक्ष एवं पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया सम्पन्न करवाएँ. भारत निर्वाचन आयोग के पर्यवेक्षक एवं उत्तराखंड के मुख्य निर्वाचन अधिकारी का कार्यालय यह सुनिश्चित करे कि कल 05 सितंबर 2023 को होने वाले चुनाव पर उक्त अफसरों के झुकाव और दबाव कोई असर न पड़े। यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि अनुराधा पाल जैसे अफसरों को या तो स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से चुनाव प्रक्रिया संचालन करने का पाठ सिखाया जाये अन्यथा चुनाव जैसा संवेदनशील कार्य उनकी निगरानी में न कराया जाये।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *