मदरसा शिक्षा बोर्ड खत्म करने के मायने

समान शिक्षा की ओर एक कदम अर्थात अल्पसंख्यक शिक्षा कानून

गोविंद सिंह

मदरसा शिक्षा बोर्ड को समाप्त करके अल्पसंख्यक शिक्षा कानून बनाकर सभी अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थानों को राष्ट्रीय शिक्षा नीति और राष्ट्रीय पाठ्यक्रम फ्रेमवर्क के छाते के नीचे लाना न सिर्फ उत्तराखंड के लिए बल्कि पूरे देश के लिए एक अभूतपूर्व घटना है। इससे प्रदेश में पढ़ रहे हर समुदाय के बच्चे के अंदर एक समानता का भाव पैदा होगा और समरस समाज का निर्माण होगा। मदरसा बोर्ड के खत्म होने पर कुछ लोग हायतौबा मचा रहे हैं, और बोल रहे हैं कि यह संविधान के विरुद्ध है। आश्चर्य की बात यह है कि वे बिना मान्यताप्राप्त मदरसे खोलने की वकालत कर रहे हैं, और बोल रहे हैं कि इन मदरसों में क्या पढ़ाया जाए, क्या नहीं, यह उनका अपना अधिकार होना चाहिए। उन्हें यह समझ में नहीं आ रहा कि एक झटके में धामी सरकार ने 40 हजार मदरसा विद्यार्थियों को मुख्यधारा में ला दिया है, जो अभी तक खोखली डिग्री के सहारे समाज में उतरते थे और मदरसों के अलावा, उन्हें कहीं कोई नौकरी नहीं मिलती थी। जिंदगी भर दोयम दर्जे के नागरिक बने रहने को अभिशप्त होते थे।

हमारे संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 के तहत देश में अल्पसंख्यकों को संरक्षण मिलता है। देश में मुसलमानों के अतिरिक्त सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध और पारसी प्रमुख अल्पसंख्यक समूह हैं। बेशक मुस्लिम सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समूह है। और कुछ राज्यों में तो वह बहुसंख्यक है। अभी तक देश में मुस्लिमों के अलावा कोई भी समूह अपना अलग से शिक्षा बोर्ड नहीं चलाता। उनके अपने स्कूल तो चलते हैं, और बहुत ऊंचे स्तर के स्कूल चलते हैं, लेकिन अपने अलग बोर्ड नहीं हैं। वे सीबीएसई या आईसीएसई या राज्यों के बोर्ड से सम्बद्ध रहते हैं जिन्हें संबन्धित सरकारों द्वारा नियंत्रित किया जाता है। उनके अपने धर्म से संबन्धित शिक्षाएं भी दी जाती हैं लेकिन मुख्य पाठ्यक्रम के लिए वे सम्बद्ध बोर्ड के निर्देशों का ही पालन करते हैं। जबकि इस्लामी मदरसों का पाठ्यक्रम सरकार के अनुसार नहीं चलता, ना ही वे सरकार के दिशा-निर्देशों का पालन करते हैं। इसलिए यहाँ से निकल कर जब विद्यार्थी बाजार में उतरते हैं, तो प्रतिस्पर्धा में टिक नहीं पाते। क्योंकि वे मुख्यधारा की शिक्षा से वाकिफ नही होते। चूंकि इनके यहाँ से निकलने वाले विद्यार्थी, वह सब नहीं पढे होते हैं, जो प्रतियोगी परीक्षाओं को में पूछा जाता है, तो परीक्षाएँ पास ही नहीं कर पाते। चाहे सिविल सेवा परीक्षाएँ हों, या राज्यों की परीक्षाएँ, इनमें मदरसों से निकले विद्यार्थियों का प्रतिशत शून्य ही रहता है। ऐसा नहीं कि सभी मदरसे ऐसे ही हैं। कुछ मदरसे बहुत ऊंचे दर्जे के भी हैं। वहाँ से निकले विद्यार्थी समाज के अन्यान्य क्षेत्रों में नाम कमा रहे हैं। देश समाज को उनका बड़ा योगदान रहा है। लेकिन मोटे तौर पर हाल के वर्षों में ज़्यादातर मदरसों पर यह आरोप लगता रहा है कि मदरसे मुस्लिम समाज में अंधविश्वास और जिहाद फैलाते हैं।

सत्तर के दशक के अंत में जब अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत समर्थित सरकार थी, तब उसे उखाड़ने के लिए पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर मदरसे खोले गए, जहां जिहाद की शिक्षा दी जाती थी। कश्मीर में प्रोक्सी वार के लिए जनरल जिया उल हक़ ने इन्हीं का सहारा लिया। इन्हीं मदरसों में तालिबान का जन्म हुआ। आज वे ही लड़के पाकिस्तान के लिए भस्मासुर बने हुए हैं। हमारे देश में भी मदरसा शिक्षा का बहुत पतन हुआ है। ये आम धारणा है कि ये अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद का मोहरा बनते हैं। इसलिए बार-बार यह मांग उठती रही है कि मदरसों को आधुनिक शिक्षा से जोड़ा जाये।

उत्तराखंड में 452 पंजीकृत मदरसे हैं। इनके अलावा 500 से अधिक मदरसे अवैध रूप से चल रहे हैं। इस कानून के बनने के बाद 237 मदरसे बंद कर दिये गए हैं। कई मदरसे पिछले कुछ वर्षों में सरकार द्वारा दी जाने वाली छात्रवृत्ति घोटाले में भी लिप्त पाये गए। उत्तराखंड में जिस तरह से इनका फैलाव बढ़ता जा रहा था और समाज में विभेद बढ़ाने की कोशिशें हो रही थीं, उसके चलते उन पर नकेल कसनी जरूरी थी। इसलिए बिना किसी संवैधानिक छेड़छाड़ के सभी अल्पसंख्यक समुदायों को एक छत्र में लाकर अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण बनाया गया है। इसमें सभी समुदायों के विशेषज्ञों को शामिल किया गया है। अल्पसंख्यक शिक्षा कानून का यह मतलब नहीं है कि सरकार किसी खास धर्म के बच्चों को उनकी धार्मिक शिक्षा से दूर करना चाहती है। सरकार तो चाहती है कि आप अपने मजहब की शिक्षा भी दो और आधुनिक शिक्षा भी दो, वह शिक्षा, जिसे सभी धर्मों से संबन्धित बच्चे ले रहे हैं। हाँ, जो भी किताबें धार्मिक शिक्षा के तौर पर पढ़ाई जाएँ, उन्हें कोई अथारिटी देखे। ताकि किसी तरह का वैमनस्य न फैले। बच्चों के मन में अन्य धर्मों के प्रति नफरत का भाव न पैदा हो। सरकार उनके संचालन में किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं करना चाहती। हाँ, मदरसे या किसी भी धार्मिक समूह द्वारा संचालित स्कूल को उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड से मान्यता लेनी होगी। यानी, एक तरफ जहां उत्तराखंड में पढ़ने वाला हर बच्चा एक समान शिक्षा ग्रहण करेगा, वहीं अन्य धर्मों से संबन्धित बच्चे अपने धर्मों के बारे में भी शिक्षा प्राप्त कर पाएंगे, जिसे अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण तय करेगा।

इस प्रकार उत्तराखंड का अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थान कानून हर धार्मिक समूह को एक प्लैटफ़ार्म पर रखते हुए समान शिक्षा की पैरवी करता है। अभी तक उपेक्षित गैर मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदायों को भी बराबरी के स्तर पर रखते हुए, उन्हें भी अपनी धार्मिक शिक्षाएं देने को प्रेरित करता है। इससे समान शिक्षा का मार्ग प्रशस्त होगा। उम्मीद है कि अन्य राज्य भी इसे अपनाएँगे।

अध्यक्ष, मीडिया सलहकार समिति, उत्तराखंड सरका

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