धामी के दो साल, सिर्फ़ बवाल ही बवाल

राकेश डंडरियाल

प्रदेश की पुष्कर सिंह धामी सरकार ने शुक्रवार को अपने दो साल पूरे किए। सरकार का कहना है कि उसने चुनौतियां का डटकर मुकाबला किया बेरोजगारों, महिलाओं और देवभूमि के हित में बड़े से बड़े और सख्त फैसले लिए। सरकार का कहना है कि ढाई साल में उसने 7600 लोगों को रोजगार दिया,जबकि शिक्षित बेरोजगारों की संख्या 883,346 है ये सभी पंजीकृत बेरोजगार हैं,यह संख्या 2021 में 807,722 थी। यानि बेरोजगारी बड़ी है, इसके अलावा सरकार ने महिलाओं को सरकारी नौकरियों में 30 प्रतिशत आरक्षण, धर्मांतरण कानून बनाया, नक़ल विरोधी कानून बनाया , अराजक तत्वों से निपटने के लिए ए दंगारोधी कानून बनाया लेकिन हल्द्वानी दंगों ने प्रदेश पर एक कलंक का टीका भी लगाया, जिस प्रदेश ने आजतक साम्प्रदायिक दंगे नहीं देखे थे वो भी देखा।

इसके अलावा धामी ने कई ऐसे फैसले लिए जो ऊपरी तौर पर हवा हवाई तो थे लेकिन धरातल पर नहीं उतर पाए। मसलन राज्य की राजधानी के मामले पर धामी बैकफुट पर ही दिखाई दिए , हाल ही में देहरादून में सम्पन्न हुआ विधानसभा सत्र इसका जीता जगता उदाहरण है कि शहरी विधायकों का धामी सरकार पर जबरदस्त प्रभाव है, वे गैरसैण को राजधानी के रूप में स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। और खबर तो ये भी है कि धामी सरकार विधानसभा भवन के लिए एक और जमीन का भी आवंटन करने वाली है। भू कानून के मामले में धामी सरकार की चुप्पी भी समझ से परे है। हाकम सिंह व उद्यान विभाग घपले के मामले में धामी क्योँ मूक बने हुए हैं, ऐसे कुछ सवाल हैं जो आज भी उनकी सरकार से पूछे जा रहे हैं। उत्तराखंड हाई कोर्ट के आदेश के बाबजूद लोकायुक्त की नियुक्ति न होना और एक मंत्री की आय से अधिक इनकम का मामला भी संदेह के घेरे में है।

अंकिता भंडारी हत्याकांड

अंकिता भंडारी हत्याकांड और उसमे भाजपा विधायक व VIP के खिलाफ कार्रवाई न करके धामी सरकार ने अपनी सबसे बड़ी भूल का परिचय दिया है, यह मामला आज भी उनका पीछा छोड़ने को तैयार नहीं है। इसी प्रकरण ने एक पत्रकार आशुतोष नेगी को अंकिता के लिए न्याय की आवाज बना दिया, सरकार ने पूरी कोशिस की कि इस आवाज को दबा दिया जाए लेकिन आग तो आग है , उसने अपना काम किया यहाँ भी धामी को पटकनी खानी पडी । लोकसभा चुनाव में अंकिता भंडारी का मामला जोर शोर से उठाया जा रहा है। राजनाथ सिंह का धाकड़ धामी यहाँ भी नाकाम रहा।

बाॅबी पंवार को किसने पैदा किया ?
उत्तराखंड बेरोजगार संघ के अध्यक्ष बाॅबी पंवार को पांच लोगों के साथ गिरफ्तार किया गया उनके खिलाफ आईपीसी की 147/188/186/171 (जी) की धाराएं लगाई गई। यही युवक बाद में देहरादून की सड़कों पर वेरोजगार और युवाओं की आवाज बन गया और आज टिहरी गढ़वाल से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनावी मैदान में है। बाॅबी पंवार और आशुतोष नेगी को धामी ने पहाड़ का नया सूत्रधार बना दिया।

पेपर लीक सरकार
धामी सरकार जैसे ही सत्ता में आई प्रदेश में जैसे पेपर लीक की बाढ़ सी आ गई, जिसमे पटवारी भर्ती लेखपाल भर्ती, जेई, एई और प्रवक्ता, स्नातक स्तरीय परीक्षा, दरोगा भर्ती जैसी परीक्षाएं शामिल थी, जिसके धामी सरकार ने एक सख्त कानून तो बनाया लेकिन उस कानून की उपलब्धि अभी तक देखने को नहीं मिली है।

स्कूलों पर लटकते ताले
राज्य के सरकारी स्कूल लगातार छात्रविहीन हो रहे हैं। हाल यह है कि 1,671 सरकारी विद्यालयों में ताला लटक गया है, जबकि अन्य 3573 बंद होने की कगार पर हैं। राज्य में पौड़ी एकमात्र ऐसा जिला है, जिसमें सबसे अधिक 315 स्कूलों में ताला लटक चुका है। छात्र न होने की वजह से राज्यभर में 1,671 स्कूल बंद हो चुके हैं। राज्य के पौड़ी जिले में 315, टिहरी गढ़वाल में 268 , पिथौरागढ़ में 224,अल्मोड़ा में 197 , चमोली में 133, देहरादून में 124, उत्तरकाशी में 122 , हरिद्वार में 24, नैनीताल में 82, रुद्रप्रयाग में 53, बागेश्वर में 53,चंपावत में 55, ऊधमसिंह नगर में 21 और स्कूलों में ताला लटक चुका है।

पलायन
उत्तराखंड से औसतन हर रोज 230 लोग पहाड़ से पलायन कर रहे हैं। 2008 से 2018 के बीच यह आंकड़ा 138 था। हालत ये है कि 2018 से 2022 के दौरान तीन लाख तीन हजार लोगों ने 4 साल के अंदर पहाड़ो से पलायन कर लिया है। जबकि उससे पहले के 10 साल यानि 2008 से 2018 के बीच उत्तराखंड की 6338 ग्राम पंचायतों से 3,83,726 लोगों ने अस्थायी रूप से पलायन किया। पलायन का दंश झेल रहे उत्तराखंड में वर्ष 2017 में भाजपा की सरकार बनने के बाद पलायन के कारणों और इसकी रोकथाम के लिए सुझाव देने के लिए ग्राम्य विकास विभाग के अंतर्गत पलायन आयोग का गठन किया गया. आयोग ने इस संबंध में प्रदेश के सभी गांवों का सर्वे कर अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी, जिसमें मुख्य रूप से पलायन के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार प्रमुख कारण बनकर सामने आया सरकार पलायन रोकने के लिए अपने स्तर पर कई योजनाएं शुरू कीं, लेकिन स्थितियां आज भी नहीं बदली हैं राज्य में पलायन का दौर अब भी जारी है।

स्वास्थ्य
उत्तराखंड में डॉक्टरों के लगभग 2900 पद हैं, जिसमे से आधे पद खाली पड़े हैं , विशेषज्ञ डॉक्टर्स के 1067 पद स्वीकृत हैं। जिसमे से 554 पद खाली पड़े हैं।जबकि 513 पदों पर ही डॉक्टर तैनात है। अकेले शहरी क्षेत्रों में 400 डॉक्टर्स की कमी है। प्रदेश के सबसे बड़े पांच राजकीय मेडिकल कॉलेज फैकल्टी की कमी से जूझ रहे हैं। इसके अलावा लैब टेक्निशंस के लगभग 977 पद खाली हैं।

सड़क
प्रदेश के 9,888 गांव आज भी सड़क मार्ग से दूर हैं। उत्तराखंड के 2,030 गांव ऐसे हैं जो मुख्य मोटर मार्गों से नहीं जुड़े हुए हैं । 1,142 गांव ऐसे हैं, जो कच्ची सड़कों से जुड़े हैं। 1,530 गांव ऐसे हैं, जहां एक से पांच किमी तक सड़क बनाई जानी हैं। वहीं 216 गांव ऐसे हैं, जहां पांच किमी से अधिक लंबाई की सड़क बनाई जानी है। इन सभी सड़कों की कुल लंबाई 6,276 किमी के आसपास है। इन गावों की जनता जब सड़क की मांग करती हैं तो प्रदेश के कैबिनेट मंत्री कहते हैं सड़क ही पलायन का कारण है, लोग सड़क बनने के बाद गांव से अपना झोला उठाकर देहरादून आ जाते हैं।

 

 

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